मन्नत
Saturday, 3 January 2015
“रख लो। तुम्हारे काम आएंगे...
पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी....“लगता है, बूढ़े को पैसों की ज़रूरत
आ पड़ी है,
वर्ना यहाँ कौन आने वाला था... अपने पेट का गड्ढ़ा भरता नहीं, घरवालों का कहाँ से भरोगे ?”
मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा।
पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफ़र की थकान दूर कर रहे थे।
इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया।
बड़े बेटे का जूता फट चुका है।वह स्कूल जाते वक्त रोज भुनभुनाता है।
पत्नी के इलाज के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं।
बाबूजी को भी अभी आना था।
घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी।
खाना खा चुकने पर
पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया।
मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आये होंगे....
पिताजी कुर्सी पर उठ कर बैठ गए। एकदम बेफिक्र...!!!
“ सुनो ” कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा।
मैं सांस रोक कर उनके मुँह की ओर देखने लगा।
रोम-रोम कान बनकर
अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।
वे बोले... “ खेती के काम में घड़ी भर भी फुर्सत नहीं मिलती।इस बखत काम का जोर है।
रात की गाड़ी से
वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक
नहीं मिली... जब तुम
परेशान होते हो,
तभी ऐसा करते हो।
उन्होंने जेब से सौ-सौ के पचास
नोट निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिए, “रख लो।
तुम्हारे काम आएंगे। धान की फसल अच्छी हो गई थी।
घर में कोई दिक्कत नहीं है तुम बहुत कमजोर लग रहे हो।ढंग से खाया-पिया करो।
यह पोस्ट chirkut बाबा के crazy वचन पेज से ली गयी है, जल्दी पोस्ट पढ़ने के लिए सीधे हमारे पेज पर आएं बहू का भी ध्यान रखो।
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
शब्द जैसे मेरे हलक में फंस कर रह गये हों।
मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार
से डांटा...“ले लो, बहुत बड़े हो गये हो क्या ..?”
“ नहीं तो।" मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए।
बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने
के लिए इसी तरह हथेली पर अठन्नी टिका देते थे,
पर तब
मेरी नज़रें आजकी तरह झुकी नहीं होती थीं।
दोस्तों एक बात हमेशा ध्यान रखे...
माँ बाप अपने बच्चो पर बोझ हो सकते हैं बच्चे उन पर बोझ कभी नही होते है।
वर्ना यहाँ कौन आने वाला था... अपने पेट का गड्ढ़ा भरता नहीं, घरवालों का कहाँ से भरोगे ?”
मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा।
पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफ़र की थकान दूर कर रहे थे।
इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया।
बड़े बेटे का जूता फट चुका है।वह स्कूल जाते वक्त रोज भुनभुनाता है।
पत्नी के इलाज के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं।
बाबूजी को भी अभी आना था।
घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी।
खाना खा चुकने पर
पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया।
मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आये होंगे....
पिताजी कुर्सी पर उठ कर बैठ गए। एकदम बेफिक्र...!!!
“ सुनो ” कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा।
मैं सांस रोक कर उनके मुँह की ओर देखने लगा।
रोम-रोम कान बनकर
अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।
वे बोले... “ खेती के काम में घड़ी भर भी फुर्सत नहीं मिलती।इस बखत काम का जोर है।
रात की गाड़ी से
वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक
नहीं मिली... जब तुम
परेशान होते हो,
तभी ऐसा करते हो।
उन्होंने जेब से सौ-सौ के पचास
नोट निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिए, “रख लो।
तुम्हारे काम आएंगे। धान की फसल अच्छी हो गई थी।
घर में कोई दिक्कत नहीं है तुम बहुत कमजोर लग रहे हो।ढंग से खाया-पिया करो।
यह पोस्ट chirkut बाबा के crazy वचन पेज से ली गयी है, जल्दी पोस्ट पढ़ने के लिए सीधे हमारे पेज पर आएं बहू का भी ध्यान रखो।
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
शब्द जैसे मेरे हलक में फंस कर रह गये हों।
मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार
से डांटा...“ले लो, बहुत बड़े हो गये हो क्या ..?”
“ नहीं तो।" मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए।
बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने
के लिए इसी तरह हथेली पर अठन्नी टिका देते थे,
पर तब
मेरी नज़रें आजकी तरह झुकी नहीं होती थीं।
दोस्तों एक बात हमेशा ध्यान रखे...
माँ बाप अपने बच्चो पर बोझ हो सकते हैं बच्चे उन पर बोझ कभी नही होते है।
Thursday, 1 January 2015
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं …………
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं …………
Tuesday, 30 December 2014
संकट मा मोचन कइसन होय.....
टीवी पेपर रोज बतामै, बढिगा पापाचार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, कलयुग है शमशार।
मरिगै मन के मानवता अब, खुल्ला घूमै पापी।
जुल्म के जकडी जनता जानै, पुलिस करै गद्दाफी।
कोर्ट मा कढिलै कबसे देखा, केस के फोटो कापी।
राम के धरती रहि-रहि रोबै,देखिके आपाधापी।
या कुकरम अब कब-कब देखी , दिल्ली हय लाचार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, है कलयुग है शमशार।
समझ ना आबै अब, संकट मा मोचन कइसन होय।
चीर हरन के रखवाले, अब जागा कुछ होय।
देश धरम के परदा माही, फेर से रखी संजोय।
या कलंक के कालिक पोता, काल का देय निचोय।
प्रेस पुलिस अउ पव्लिक पूछै, का किहिस सरकार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, है कलयुग है शमशार।
गांव गली अउ शहर नगर मा, सब जन मिल के सोची।
अपने घर के लडिकउनेन का, गलत काम से काम से टोची।
फैशन फोक्कस है फोकट के,ओभर है अब खोची।
या समाज के संरक्षण मा, आपन मिड्डा रोची।
कहै उमेश या दुख का दिखके, दिल मा होय दरार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, कलयुग है शमशार।
टीवी पेपर रोज बतामै, बढिगा पापाचार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, कलयुग है शमशार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, कलयुग है शमशार।
मरिगै मन के मानवता अब, खुल्ला घूमै पापी।
जुल्म के जकडी जनता जानै, पुलिस करै गद्दाफी।
कोर्ट मा कढिलै कबसे देखा, केस के फोटो कापी।
राम के धरती रहि-रहि रोबै,देखिके आपाधापी।
या कुकरम अब कब-कब देखी , दिल्ली हय लाचार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, है कलयुग है शमशार।
समझ ना आबै अब, संकट मा मोचन कइसन होय।
चीर हरन के रखवाले, अब जागा कुछ होय।
देश धरम के परदा माही, फेर से रखी संजोय।
या कलंक के कालिक पोता, काल का देय निचोय।
प्रेस पुलिस अउ पव्लिक पूछै, का किहिस सरकार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, है कलयुग है शमशार।
गांव गली अउ शहर नगर मा, सब जन मिल के सोची।
अपने घर के लडिकउनेन का, गलत काम से काम से टोची।
फैशन फोक्कस है फोकट के,ओभर है अब खोची।
या समाज के संरक्षण मा, आपन मिड्डा रोची।
कहै उमेश या दुख का दिखके, दिल मा होय दरार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, कलयुग है शमशार।
टीवी पेपर रोज बतामै, बढिगा पापाचार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, कलयुग है शमशार।
तब विरोध क्यों नहीं किया जब _______________ ___________
जब हम ''मानव'' स्वयं अपने ''देवी देवताओं'' का रूप धारण कर लेते है
हम रामलीला और रासलीला के नाम पर भगवान बनने का ढोंग करते है
भगवान के नाम पर झूठी 'शपथ' लेते है, भीख मांगते है, चन्दा मांगते है
भगवान का प्रतिनिधित्व (दलाली) करते है, मोक्ष एवं मुक्ति का व्यापार
हमने ''कभी'' विरोध नहीं किया ? _____ परिणाम _____________
आज भगवान के नाम का इस्तेमाल सिनेमा व विज्ञापनों में होने लगा है
तो भाई ये दोष किसका है ? _______________ ______________
कोई बताएगा ! ये आज हम किस का ''विरोध'' किस से कर रहे है ? .....
जबकि भगवान तो 'निराकार' है वो हमारे निश्चय में है, विश्वास में है ! ..
जब हम ''मानव'' स्वयं अपने ''देवी देवताओं'' का रूप धारण कर लेते है
हम रामलीला और रासलीला के नाम पर भगवान बनने का ढोंग करते है
भगवान के नाम पर झूठी 'शपथ' लेते है, भीख मांगते है, चन्दा मांगते है
भगवान का प्रतिनिधित्व (दलाली) करते है, मोक्ष एवं मुक्ति का व्यापार
हमने ''कभी'' विरोध नहीं किया ? _____ परिणाम _____________
आज भगवान के नाम का इस्तेमाल सिनेमा व विज्ञापनों में होने लगा है
तो भाई ये दोष किसका है ? _______________
कोई बताएगा ! ये आज हम किस का ''विरोध'' किस से कर रहे है ? .....
जबकि भगवान तो 'निराकार' है वो हमारे निश्चय में है, विश्वास में है ! ..
Monday, 22 December 2014
..किताब..
..किताब..
अपनी जुब़ा पे लगाम लगाए,
किताबें तो बहुत कुछ कह जाती हैं
काले आखरों में ना जाने,
कितने किस्से गड़ जाती है
कहती है वही जो समझते हैं सभी
समझाती वही जो समझते हैं सभी
तभी तो कहते हैं कि,
किताबें सिर्फ गुन गुनाती हंै...
किताबें खामोशी में बहुत कुछ कह जाती हैं।
सपनों की उल्झन सुलझन सी लगेगी,
जब कोई सखी इसको अपनी सहेली कहेगी।
जब कोई इसका सखा बन जाए,
तब हर दम इसके भीतर सवालों के जब़ाव पाए।
तभी तो कहतें हैं कि,
किताबें सिर्फ गुन गुनाती हैं...
समझ को यह अलबेली है,
विचारों की कठिन पहेली है
विन कहे यह सब कह देती है,
खोजो इसमें तो मिले हर दम मिले एक नई सहेली है।
तभी तो कहते हैं कि,
किताबें सिर्फ गुन गुनाती है.....
...राजीव
Sunday, 24 July 2011
सोच इंसानियत की
ये जो सोच हे इन्सान को जीने के तरीके में मदत करती हे .
पर जिन्दगी एक एहसास की भांति जीने में भरोसा करती हे
ताकि इंसानियत पे कभी हेवानियत न हावी हो सके
क्यो की हेवानियत के चलते इन्सान वेह्शी हो जाता हे और हर रिश्ते और नाते
को भोल जाता हे
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