Monday, 22 December 2014

..किताब..

..किताब..
अपनी जुब़ा पे लगाम लगाए,
किताबें तो बहुत कुछ कह जाती हैं
काले आखरों में ना जाने,
 कितने किस्से गड़ जाती है
कहती है वही जो समझते हैं सभी
समझाती वही जो समझते हैं सभी
तभी तो कहते हैं कि,
किताबें सिर्फ गुन गुनाती हंै...
किताबें खामोशी में बहुत कुछ कह जाती हैं।
सपनों की उल्झन सुलझन सी लगेगी, 
जब कोई सखी इसको अपनी सहेली कहेगी।
जब कोई इसका सखा बन जाए,  
तब हर दम इसके भीतर सवालों के जब़ाव पाए।
         तभी तो कहतें हैं कि, 
          किताबें सिर्फ गुन गुनाती हैं...
समझ को यह अलबेली है,       
विचारों की कठिन पहेली है
विन कहे यह सब कह देती है, 
खोजो इसमें तो मिले हर दम मिले एक नई सहेली है।
तभी तो कहते हैं कि, 
किताबें सिर्फ गुन गुनाती है.....

...राजीव

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