Tuesday, 30 December 2014

संकट मा मोचन कइसन होय.....

 टीवी पेपर रोज बतामै, बढिगा पापाचार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, कलयुग है शमशार।

मरिगै मन के मानवता अब, खुल्ला घूमै पापी।
जुल्म के जकडी जनता जानै, पुलिस करै गद्दाफी।
कोर्ट मा कढिलै कबसे देखा, केस के फोटो कापी।
राम के धरती रहि-रहि रोबै,देखिके आपाधापी।
या कुकरम अब कब-कब देखी , दिल्ली हय लाचार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, है कलयुग है शमशार।

समझ ना आबै अब, संकट मा मोचन कइसन होय।
चीर हरन के रखवाले, अब जागा कुछ होय।
देश धरम के परदा माही, फेर से रखी संजोय।
या कलंक के कालिक पोता, काल का देय निचोय।
प्रेस पुलिस अउ पव्लिक पूछै, का किहिस सरकार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, है कलयुग है शमशार

गांव गली अउ शहर नगर मा, सब जन मिल के सोची।
अपने घर के लडिकउनेन का, गलत काम से काम से टोची।
फैशन फोक्कस है फोकट के,ओभर है अब खोची।
या समाज के संरक्षण मा, आपन मिड्डा रोची।
कहै उमेश या दुख का दिखके, दिल मा होय दरार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, कलयुग है शमशार

टीवी पेपर रोज बतामै, बढिगा पापाचार।
चला बचाई बहिनी बिटिया, कलयुग है शमशार
तब विरोध क्यों नहीं किया जब __________________________
जब हम ''मानव'' स्वयं अपने ''देवी देवताओं'' का रूप धारण कर लेते है
हम रामलीला और रासलीला के नाम पर भगवान बनने का ढोंग करते है
भगवान के नाम पर झूठी 'शपथ' लेते है, भीख मांगते है, चन्दा मांगते है
भगवान का प्रतिनिधित्व (दलाली) करते है, मोक्ष एवं मुक्ति का व्यापार
हमने ''कभी'' विरोध नहीं किया ? _____ परिणाम _____________
आज भगवान के नाम का इस्तेमाल सिनेमा व विज्ञापनों में होने लगा है
तो भाई ये दोष किसका है ? _____________________________
कोई बताएगा ! ये आज हम किस का ''विरोध'' किस से कर रहे है ? .....
 जबकि भगवान तो 'निराकार' है वो हमारे निश्चय में है, विश्वास में है ! ..

Monday, 22 December 2014

..किताब..

..किताब..
अपनी जुब़ा पे लगाम लगाए,
किताबें तो बहुत कुछ कह जाती हैं
काले आखरों में ना जाने,
 कितने किस्से गड़ जाती है
कहती है वही जो समझते हैं सभी
समझाती वही जो समझते हैं सभी
तभी तो कहते हैं कि,
किताबें सिर्फ गुन गुनाती हंै...
किताबें खामोशी में बहुत कुछ कह जाती हैं।
सपनों की उल्झन सुलझन सी लगेगी, 
जब कोई सखी इसको अपनी सहेली कहेगी।
जब कोई इसका सखा बन जाए,  
तब हर दम इसके भीतर सवालों के जब़ाव पाए।
         तभी तो कहतें हैं कि, 
          किताबें सिर्फ गुन गुनाती हैं...
समझ को यह अलबेली है,       
विचारों की कठिन पहेली है
विन कहे यह सब कह देती है, 
खोजो इसमें तो मिले हर दम मिले एक नई सहेली है।
तभी तो कहते हैं कि, 
किताबें सिर्फ गुन गुनाती है.....

...राजीव